मुंबई, अप्रैल 2026.
मेजर गौरव आर्या ने कोटक
प्राइवेट बैंकिंग के कार्यक्रम 'टेक एंड काउंटर टेक'
(टीएसीटी)में कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष का असली विजेता चीन है, क्योंकि बीजिंग बिना एक गोली चलाए रणनीतिक फायदा उठा रहा है। कोटक प्राइवेट
द्वारा आयोजित इस खास आमंत्रण-मात्र वाले मंच पर श्री आर्या ने श्रोताओं से कहा कि
जब सबकी नजरें इजरायल,
ईरान और अमेरिका पर टिकी हैं, चीन
चुपचाप और सुनियोजित तरीके से अपना फायदा बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा, "सब लोग इजरायल,
ईरान और अमेरिका को देख रहे हैं, लेकिन
असल में फायदा उठाने वाला देश चीन है।" उन्होंने यह भी कहा कि यह संघर्ष एक
लंबे और शीत युद्ध का हिस्सा है जिसमें चीन अस्थिरता का फायदा उठाकर
प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करता है, ऊर्जा मार्गों पर अपनी
पकड़ मजबूत करता है और पश्चिमी ध्यान को एक साथ कई मोर्चों पर बिखेर देता है।
कोटकएएमसी के मैनेजिंग
डायरेक्टर नीलेश शाह की अध्यक्षता में हुए इस सत्र में श्री आर्या ने चेतायाकि यह
फायदा भारत की अपनी कमजोरियों को भी उजागर करता है। उन्होंने कहा कि चीन ने बिना
किसी विचलन के तीन दशक तक अपनी उत्पादन क्षमता, लॉजिस्टिक्स
का ढांचा और सैन्य ताकत खड़ी की,
जबकि भारत सद्भावना और नैतिक स्थिति पर बहुत ज्यादा निर्भर
रहा। उन्होंने कहा,
"वे चुप रहे, अपनी अर्थव्यवस्था बनाते
रहे और एक दिन दुनिया को पता चला कि उनके पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना
है।" भारत के लिए उनका संदेश बिल्कुल सीधा था। उन्होंने कहा, "आपको बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग (उत्पादन) चाहिए, बहुत बड़े पैमाने पर।" उनका कहना था कि औद्योगिक क्षमता के बिना सैन्य
महत्वाकांक्षा और रणनीतिक स्वायत्ततामहज नारे बनकर रह जाते हैं, असली ताकत नहीं।
'टेक
एंड काउंटर टेक'
के इस दूसरे संस्करण में श्री आर्या की जोड़ी अर्थशास्त्री
नीलकंठ मिश्रा के साथ बनाई गई थी ताकि यह परखा जा सके कि भू-राजनीतिक झटकों के बीच
भारत की विकास गाथा कितनी टिकाऊ रह सकती है। श्री शाह ने चर्चा को सुर्खियों से
हटाकर नतीजों की तरफ मोड़ा और पैनल से पूछा कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का
पूंजी प्रवाह,
आपूर्ति श्रृंखलाओं, सुरक्षा
और राज्य क्षमता पर क्या असर पड़ता है। नीलकंठ मिश्रा ने आर्थिक ढांचा तैयार किया
और कहा कि भारत आज पिछले संकटों के मुकाबले बेहतर ढंग से तैयार है, जबकि श्री आर्या ने उन सुरक्षा पहलुओं पर ध्यान दिलाया जिन्हें बैलेंस शीट और
बाजार के मॉडल अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
'भारत को ज्यादा आतंकी हमलों के लिए तैयार रहना होगा'
श्री आर्या ने कहा कि ये
खतरे पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगे। वे पलटवार को लेकर बिल्कुल दो-टूक थे।
उन्होंने कहा, "आतंकी हमले सौ फीसदी बढ़ेंगे।भारत में, यूरोप में, अमेरिका
मेंअकेले दम पर किए गए हमले, स्लीपर
सेल्स। यह अपरिहार्य है।" उन्होंने तर्क दिया कि आधुनिक युद्ध सीमाओं पर खत्म
नहीं होते, बल्कि
वे नेटवर्क, विचारधारा
और छद्म समूहों के माध्यम से फैलते हैं। ये युद्ध दूर देशों को भी हिंसा के दायरे
में खींच लेते हैं, चाहे
वे देश इसमें शामिल होना चाहें या नहीं।
भारत के लिए यह हकीकत घर
में कड़े फैसले लेने की जरूरत को और पैना बना देती है। श्री आर्या बार-बार रक्षा
खर्च की बात पर लौटे और उन्होंनेमौजूदा स्तर को आगे आने वाले खतरों के लिहाज से
नाकाफी बताया। उन्होंने कहा,
"अगर प्रधानमंत्री मुझसे एक सिफारिश मांगें तो मैं यही
कहूंगा। रक्षा खर्च जीडीपी के 3.5
फीसदी तक होना ही चाहिए। इसके अलावा कोई रास्ता नहीं
है।" उन्होंने यह भी कहा कि नैतिक अधिकार, प्रतिरोध
की जगह नहीं ले सकता। श्री आर्या ने कहा, "डर के बिना दोस्ती नहीं
होती,"
और तर्क दिया कि आर्थिक, कूटनीतिक
और सैन्य ताकत दिखाने की क्षमता ही तय करती है कि कोई देश घटनाओं को आकार देता है
या उनका खामियाजा भुगतता है।
उनकी चेतावनीफिर चीन पर
आकर टिकी। श्री आर्या ने कहा कि बीजिंग तकलीफ सहने, धैर्य
से निवेश करने और असमानता का फायदा उठाने की क्षमता रखता है, चाहे वह रणनीतिक मार्गों के जरिए हो, आपूर्ति श्रृंखलाओं के
जरिए हो या छद्म संघर्ष के जरिए। इसके उलट भारत अभी भी ताकत को एक ढांचागत जरूरत
नहीं बल्कि कभी-कभार की चीज मानता है। उन्होंने कहा, "चीन आपको सद्भावना के बल पर जीने नहीं देगा। वे ताकत की इज्जत करते हैं और वह
ताकत उद्योग से आती है,
रक्षा विनिर्माण से आती है, आर्थिक
मजबूती से आती है।"
श्री आर्या ने कहा कि भारत के पास अभी भी काम करने की
खिड़की खुली है,
बशर्ते वह विकास, उत्पादन और सुरक्षा को एक
ही रणनीति के हिस्से के रूप में जोड़े। उनके नजरिए से पश्चिम एशिया का संघर्ष कोई
दूर की जंग नहीं बल्कि उस अव्यवस्था की रिहर्सल है जो आने वाले दशक को परिभाषित
करेगी। उन्होंने कहा,
"दुनिया अब पहले जैसी व्यवस्थित नहीं रही। अगर आप तैयार नहीं
हैं तो कीमत चुकानी पड़ेगी।"